नारायणपुर में टसर रेशम ने बदली आदिवासियों की तकदीर

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रायपुर : छत्तीसगढ़ के घने जंगलों और शांत वादियों के बीच बसा नारायणपुर जिला आज रेशम उत्पादन के क्षेत्र में एक नई और सुनहरी पहचान गढ़ रहा है। यहाँ के रेशम विभाग द्वारा संचालित ‘टसर रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम’ स्थानीय आदिवासी परिवारों के जीवन में एक मूक लेकिन बेहद असरदार आर्थिक क्रांति का जरिया बन चुका है। पारंपरिक खेती और मजदूरी पर निर्भर रहने वाले जो ग्रामीण कभी स्थानीय स्तर पर रोजगार न होने के कारण पलायन करने को मजबूर थे, वे आज अपने ही घर-आँगन में साल भर में तीन-तीन फसलें लेकर आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख रहे हैं।

मात्र 2 रूपए में मिल रहे अंडे, ककून बैंक से बिचौलियों का खेल खत्म

रेशम विभाग ने इस पूरी व्यवस्था को बेहद सुलभ और पारदर्शी बनाया है। विभाग अपने पौधारोपित क्षेत्रों में महिला और पुरुष स्व-सहायता समूहों के माध्यम से टसर कृमिपालन का कार्य करा रहा है। ग्रामीणों पर शुरुआत में कोई आर्थिक बोझ न आए, इसके लिए विभाग मात्र 2 रुपये की मामूली अनुदान दर पर टसर कृमि के अंडे उपलब्ध कराता है। हितग्राही लगभग 45 से 50 दिनों तक पूरी लगन के साथ इन कृमियों का पालन करते हैं, जिसके बाद पेड़ों पर चमकीले कोसाफल (ककून) तैयार हो जाते हैं। ग्रामीणों को अपनी फसल बेचने के लिए बाजारों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। विभाग ने खुद ‘ककून बैंक’ की स्थापना की है, जहाँ शासन द्वारा निर्धारित तय दरों पर कोसाफल की सुरक्षित खरीदी की जाती है।

ग्राम डूमरतराई में वृहत उत्पादन, हर हाथ को मिली बड़ी कमाई

इस योजना की सफलता का सबसे जीवंत और खूबसूरत नजारा नारायणपुर के ग्राम डूमरतराई के टसर केंद्र में देखने को मिला। चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान यहाँ के 15 स्थानीय ग्रामीणों (जिसमें महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश करते हुए 10 महिलाएँ और 5 पुरुष शामिल हैं) ने मिलकर कृमिपालन का जिम्मा उठाया। इस समूह ने अपनी सामूहिक मेहनत से कुल 2 लाख 11 हजार 167 नग कोसाफल का बंपर उत्पादन किया।

लाखों की आमदनी

इस फसल को ककून बैंक में बेचने पर पूरे समूह को कुल 9 लाख 34 हजार 927 रुपये की भारी-भरकम आमदनी हुई। सीधे खाते में भुगतान महज कुछ महीनों के भीतर प्रत्येक हितग्राही के हिस्से में औसतन 62 हजार 328 रुपये की अतिरिक्त आय आई। शासन की पारदर्शिता के चलते पूरी राशि सीधे हितग्राहियों के बैंक खातों में जमा की गई, जिससे बिचौलियों का डर और भुगतान में देरी का झंझट पूरी तरह खत्म हो गया।

सिर्फ 50 दिन नहीं, साल भर मिलता है रोजगार

टसर रेशम योजना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह ग्रामीणों को सिर्फ 50 दिनों के कृमिपालन तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें साल भर का मुकम्मल आसरा देती है। कृमिपालन का सीजन खत्म होने के बाद भी विभागीय जंगलों में निराई, गुड़ाई और पौधों के रख-रखाव जैसे कार्यों के जरिए इन ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर लगातार रोजगार मिलता रहता है।

नारायणपुर के ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है। घर की महिलाओं के हाथ में सीधे पैसा आने से उनका आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता तेजी से बढ़ी है। कभी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने वाला नारायणपुर का यह अंचल आज टसर रेशम के धागों से अपनी आत्मनिर्भरता की कहानी खुद बुन रहा है और पूरे बस्तर संभाग के लिए आजीविका का एक बेहतरीन रोल मॉडल बन चुका है।